की धर्मं मतलब " कर्म " !, हा धर्मंमतलब " कर्म " यही सही है !!!
फिर "धर्मं " का ठेका लेनेवाले कुछ अलग जुबान क्यों बोलते है ??
Sunday, December 27, 2009
पता नहीं ऐसा क्यों होता है की हम भरे बाजार में अपने को अकेला पाते है.. दिल से निकले शब्द दिमाग से होके जब निकलते है तो "रंग" क्यों बदलते है......
Monday, October 05, 2009
जख्म क्या बोलना, क्या कहना, क्या सुनाना आपकी मर्जी.... क्योकि जबान आपकी और आपकी मर्जीभी लेकिन कभी सोचके तो देखो की आपके कहे हुए शब्दोने जख्म तो नही बनाए.......
Thursday, December 18, 2008
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